संत कमल किशोर ने बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड

संत कमलकिशोर ने रक्तदान के क्षेत्र में बनाया विश्व रिकॉर्ड
अब तक कर चुके हैं 145 बार रक्तदान -“ब्रावो इंटरनेशनल बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस” में हुआ नाम दर्ज

विरेन्द्र चौधरी/हरविंदर लांबा

सहारनपुर : हैंड्स टू केयर वेल्फेयर सोसाइटी द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में आज संत कमलकिशोर को विश्व में सर्वाधिक 144 बार रक्तदान करने के लिए “ब्रावो इंटरनेशनल बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस” में नाम दर्ज होने पर सम्मानित किया गया | इस अवसर पर मुख्यअतिथि डी आई जी उपेन्द्र कुमार अग्रवाल और विशिष्ट अतिथि कमांडेंट कर्नल मंगल सिंह ने संयुक्त रूप से सन्त कमलकिशोर को ब्रावो इंटरनेशनल बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस, शारजाह द्वारा भेजे गए प्रमाण-पत्र, मैडल , स्मृति चिन्ह, रेकॉर्ड होल्डर कार्ड और रैड चैनल एंट्री कार्ड देकर सम्मानित किया !
ज्ञात हो कि 63 वर्षीय सन्त कमलकिशोर 18 वर्ष की आयु से लगातार रक्तदान करते आ रहे हैं और उनका नाम पूर्व में “इंडिया बुक ऑफ रेकॉर्ड्स” “एशिया बुक ऑफ रेकॉर्ड्स” “इंडिया अचिवर्स बुक ऑफ रेकॉर्ड्स” में सम्मिलित किया जा चुका है ! सन्त कमलकिशोर को “रक्तपुरुष” की उपाधि से भी नवाजा जा चुका है !
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के पुलिस उपमहानिरीक्षक उपेंद्र कुमार अग्रवाल ने सन्त कमलकिशोर को रक्तदान का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ और समाज के लिए प्रेरणा स्रोत बताते हुए कहा की भारत में हर तीसरे सेकंड पर किसी न किसी व्यक्ति को रक्त के 1 यूनिट की आवश्यकता पड़ती है जबकि केवल 30 % लोग ही रक्तदान करने के पात्र है क्योंकि जो लोग रक्तदान नहीं कर सकते उनमे —– जिन्हे हेपटाइटिस बी एवं सी, एच. आई. वी. , मलेरिया, टाइफाइड, डेंगू, बार-बार बुखार होना, भार में कमी, रात में पसीना आना, लगातार खांसी वाले रोगी, ऐसे रोगी जिनकी लसिका ग्रंथियां सूज गयी हों, गर्भवती स्त्रियाँ, रक्ताल्पता के रोगी, जिन्होने शरीर के किसी अंग पर टैटू गुदवाया हो, अंग प्रत्यारोपण हुआ हो, मधुमेह के रोगी, उपदंश, यौन संक्रमण, कैंसर, हृदय रोग, टी. बी., श्वास रोग से पीड़ित, शराब पीने वाले,अथवा जिन्होने अभी-अभी एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन किया हो|
विशिष्ट अतिथि कर्नल मंगल सिंह ने रक्तदान कि महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि नियमित रकदान करने वाले लोगों को अर्बुद (cancer) नहीं होता और न ही उनके यकृत (Liver), अग्नाशय (Pancreas) को हानि पहुँचती है ! हृदय एवं मस्तिष्क की आयु बढ़ जाती है अतः वे सामान्य व्यक्ति से अधिक स्वस्थ एवं दीर्घायु वाला जीवन जीते है जिसका ज्वलंत उदाहरण सन्त कमल किशोर के रूप मे हमारे सामने है ! रक्तदान से केवल एक व्यक्ति की जान नहीं बचती अपितु उससे जुड़े उसके परिवार के लिए भी ये नए जीवन की तरह है ! भारतीय संस्कृति में विद्यादान को अन्नदान से भी ऊपर की श्रेणी में रखा गया है परंतु रक्तदान सबसे बड़ा दान है इससे ऊपर कोई भी दान नहीं। संत कमल किशोर इतने समय से लगातार रक्तदान कर “नर सेवा नारायण सेवा” की उक्ति को चरितार्थ कर रहे है ये बहुत बड़ी उपलब्धि है !
हैंड्स टू केयर वेल्फेयर सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष परम बत्रा ने बताया कि संस्था के संरक्षक सन्त कमल किशोर से प्रेरणा लेकर सहारनपुर के युवाओं में रक्तदान के प्रति उत्साह बढ़ा है और संस्था के साथ जुड़कर वे नियमित रूप से रक्तदान करने लगे है ! उन्होने कहा कि किसी कि जान बचाने के लिए स्वयं डॉक्टर होना ज़रूरी नहीं अपितु रक्तदान करके भी ये कार्य किया जा सकता है ! रक्त की कमी से किसी की जान न जाए यही संस्था के सभी सदस्यों का प्रण है और इसके लिए हम सभी दिन रात किसी भी समय तत्पर रहते है !
सन्त कमलकिशोर ने इस सम्मान को भारतवर्ष के सभी रक्तदाताओं को समर्पित करते हुए कहा कि यह उनका नहीं अपितु सभी रक्तदाताओं का सम्मान है ! रक्त का कोई विकल्प वैज्ञानिक आज तक तैयार नहीं कर पाये ऐसे मैं स्वैच्छिक रक्तदान कि महत्ता बहुत बढ़ जाती है ! 1 रक्तदान 4 लोगों कि जान बचा सकता है !रक्तदान करने पर मन को शांति का अनुभव होता है अतः सभी को धर्म ,जाति से ऊपर उठ कर रक्तदान करना चाहिए |
कार्यक्रम को सफल बनाने में श्रीमती नीनाधींगड़ा,सुमितमलिक,कार्तिकखुराना,विजयदत्ता,अवनीतकौर,टिंकू अरोड़ा,प्रवीनचोपड़ा,कुनाल निझावन,अनीशमिगलानी,पूजागिल्होत्रा,वर्षाचोपड़ा,दीपकअलाहाबादी,रणधीर पुनदिर, विजय दत्ता, कार्तिक खुराना, गुरभेज सिंह पेजी, कमल चुग, अंकित अरोड़ा, तरुण लखानी, अंकित धवन, निकिता मनुजा, स. एम. पी. सिंह चावला,नरेंद्र बालियान, कवलजीत सिंह लूथरा, जितेंद्र परूथी, मोहम्मद अली, अब्दुल सलाम, मो जुन्नैद, महन्त जोगेन्द्रनाथ, रमेश कौशिक, रवि कुमार, के के गर्ग, तुलसी बत्रा, त्रिभुवन अलाहाबादी, वैभव शर्मा, डॉ फिरोज़, गुलशन नागपाल , अमित कुमार, सुश्री मनीषा, दलजीत कोछड़, कोमल अरोडा, शशि सैनी आदि गणमान्य लोगों कि उपस्थिति उल्लेखनीय रही !
कार्यक्रम का सुघढ़ संचालन डॉ एम. पी. सिंह चावला ने किया !

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